गन्ना विकास परिषदें

गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग

हमारे बारे में

  महत्वपूर्ण व्यक्ति
श्री संजय भूसरेड्डी

आयुक्त, गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग, उ० प्र०

आर० पी० यादव

अपर गन्ना आयुक्त (विकास)

वर्ष 1948 तक गन्ना विकास के क्रिया-कलापों और गन्ने का क्रय-विक्रय एक साथ सम्मिलित था जिसका कृषकों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं था। वर्ष 1948-49 में उत्तर प्रदेश में गन्ने के विकास व सघन खेती की पंचवर्षीय योजना क्रियान्वित की गयी और तत्समय इण्डियन सेन्ट्रल शुगरकेन कमेटी ने कुछ अंश तक वित्तीय अनुदान दिया। इस योजना के अन्तर्गत प्रत्येक चीनी मिल गेट स्तर पर गन्ना विकास परिषदों की स्थापना हुई। इस योजना के सतत् तीन वर्षो तक कार्यान्वित रहने पर इसे प्रदेश की पंचतर्षीय योजना में सम्मिलित किया गया।

गन्ना विकास परिषद का गठन उ०प्र० गन्ना (पूर्ति एवं खरीद विनियम) अधिनियम 1953 की धारा - 5 एवं उ०प्र० गन्ना (पूर्ति एवं खरीद विनियम) नियमावली 1954 के नियम - 8 के अन्तर्गत किया जाता है।

वर्ष 1948-49 में गन्ना विकास परिषदों का गठन गन्ना विकास पर अधिक बल के साथ-साथ चीनी मिल परिक्षेत्र स्तर पर सहकारी गन्ना समितियों के गन्ना क्रय विक्रय सम्बन्धी क्रियाकलापों पर भी प्रभाव पड़ा। गन्ना विकास परिषदों का कार्य परिक्षेत्र हेतु संसाधनो को जुटाना एवं सिंचाई साधनों तथा कृषि सुविधाओं के विक्रय के साथ- साथ गन्ने की फसल का रोग एवं कीट से बचाव हेतु आवश्यक कदम उठाना है।

गन्ना विकास परिषदों की निधि में प्रदेश तथा केन्द्र सरकार द्वारा प्रदत्त अनुदान, चीनी मिलों का अंशदान एवं चीनी मिलों, गुड़, राब तथा खाण्डसारी निर्माताओं द्वारा क्रय किये गन्ने पर कमीशन आदि सम्मिलित है। वर्तमान में प्रदेश में 152 गन्ना विकास परिषदें है।